Vinod Agarwal Biography In Hindi | विनोद अग्रवाल की जीवनी

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आध्‍यात्‍म जगत में आपने बहुत से नाम सुने होंगे और शायद उनके बारे में जानते भी होंगे, लेकिन श्री विनोद अग्रवाल जी (Vinod Agarwal Biography In Hindi) आध्‍यात्‍म जगत के एक ऐसे सितारे थे,



जिन्‍होंने आध्‍यात्‍म जगत में एक नया अध्‍याय जोड़ा, जिसे शायद ही कोई दोहरा पायेगा।

क्‍योंकि भगवान से प्रेम करने का इतना सरल मार्ग अपने भजनों के माध्‍यम से जो दे गये हैं, वह कार्य शायद ही कोई दोबारा कर पाये।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

वैसे तो प्राय: आपने देखा होगा कि कथावाचक अपनी कथा के दौरान बीच-बीच में भजनों की भी प्रस्‍तुति देते हैं और भजन गायक अपने कार्यक्रम में केवल भजन ही गाते हैं

जबकि श्री विनोद अग्रवाल जी (vinod agarwal ki jivani) एक मात्र ऐसे भजन सम्राट थे, जो अपने भजनों में बहुत ही सरल तरीके से सारे वेद शास्‍त्रों का सार सूक्ष्‍म रूप में समझा दिया करते थे।

उनका यही एक गुण श्रोताओं को इतना पसंद आता था कि एक साथ एक पंडाल में दस हजार से अधिक संख्‍या में लोग तीन घंटे से भी अधिक समय तक उनके भजनों का आनंद लेते थे

और विनोद अग्रवाल जी के भजनों में इतने तल्‍लीन हो जाते थे कि बीच में ही नाचने और रोने लगते थे, जो प्राय: किसी भी कथावाचक की कथा में या भजन गायक के कार्यक्रम में नहीं देखा गया होगा।



वैसे तो उनके बारे में बहुत सी ऐसी रोचक जानकारियॉ हैं, जिनका वर्णन आगे मैं विस्‍तार से करूंगा इसलिए आप लेख को पूरा पढि़येगा,

क्‍योंकि मैंने बहुत ही विश्‍वसनीय सूत्रों के द्वारा उनके बारे में गूढ़ जानकारी जुटायी है, जिसे आप पढ़कर आनंदमय हो जायेंगे, ऐसा मेरा विश्‍वास है।

चलिये लेख की शुरुआत करते हैं। 

विनोद अग्रवाल की जीवनी

परम रसिक भजन सम्राट श्री विनोद अग्रवाल जी (vinod agarwal ji) को उनके चाहने वाले, उन्‍हें सुनने वाले,उन्‍हें मानने वाले एवं उनका अनुशरण करने वाले प्‍यार से उन्‍हें ‘बाउजी’ कहकर बुलाया करते थे।

चूंकि हम भी उनके चाहने वालों में से हैं इसलिए आगे के आलेख में हम भी उन्‍हें ‘बाउजी’ के नाम से ही संबोधित करेंगे।

श्री विनोद अग्रवाल जी का जन्‍म | vinod agarwal date of birth

इस पोस्ट मे क्या है देखो

श्री विनोद अग्रवाल जी का जन्‍म 06 जून 1955 को दिल्‍ली में हुआ था।

श्री विनोद अग्रवाल जी की शिक्षा:-

बाउजी 07 वर्ष की आयु तक दिल्‍ली में रहे, जहॉ उन्‍होंने कक्षा 02 तक की पढ़ाई की।

वर्ष 1962 में वे अपने परिवार के साथ मुंबई आ गये, जहां से उन्होंने अपनी स्‍नातक की पढ़ाई पूरी की। मुंबई में वे वर्ष 2012 तक रहे।

चूंकि बाउजी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे इसलिए जब वे कक्षा 11वीं में थे तो उनकी प्रबल इच्‍छा थी कि

वे डॉक्‍टर बने और समाज में विभिन्‍न रोगों से पीडि़त व्‍यक्तियों की सेवा करके उनके दुख को दूर करें और लोगों को ईश्‍वर की भक्ति से जोड़े।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

बाउजी गणित, फिजिक्‍स, केमि‍स्‍ट्री, विज्ञान में निपुण थे इसलिए वे अपने सहपाठियों को नि:शुल्‍क ट्यूशन पढ़ाते थे,

क्‍योंकि उनका मानना था कि ईश्‍वर ने उन्‍हें जो कुछ भी दिया है, उसका नि:शुल्‍क वितरण करना है,

लेकिन स्‍नातक के बाद उन्‍होंने पढ़ाई छोड़ दी और अपने पिता के साथ व्‍यवसाय में सहयोग करने लगे। 

श्री विनोद अग्रवाल जी की शादी | vinod agarwal marriage

20 वर्ष की आयु में बाउजी (vinod agarwal) का विवाह हो गया था। उनकी धर्मपत्‍नी का नाम श्रीमती कुसुमलता अग्रवाल है, जो दिल्‍ली की रहने वाली हैं।

जो बहुत ही सुशील, साफ व सरल मन की एक आदर्श ग्रहिणी हैं और बाउजी के हर निर्णय में वो पूरे मन से सहयोग भी करती थी,

जिसका परिणाम है कि बाउजी ने इतनी सहजता से हरिनाम जन-जन तक पहुंचाया।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

इस बात को बाउजी भगवान की ही कृपा मानते हैं कि उन्‍हें एक बहुत ही अच्‍छी जीवनसंगिनी मिलीं।

बाउजी ने कई इंटरव्‍यू में इस बात को बहुत ही स्‍पष्‍टता से बताया है।


Vinod agarwal wikipedia 

नाम (Name)श्री विनोद अग्रवाल जी
जन्‍म तिथि (Date Of Birth)06 जून 1955
जन्‍म स्‍थान (Birth of Place)दिल्‍ली
गुरूस्‍वामी श्री मुकुंदहरि जी महाराज
पत्‍नीश्रीमती कुसुमलता अग्रवाल
पूर्व पता गोविंद की गली, पुष्‍पांजलि वैकुण्‍ठ फेज-१, टेहरा रोड, वृन्‍दावन, उत्‍तर प्रदेश
वर्तमानगोलोकधाम
Youtube Channelगोविंद की गली

श्री विनोद अग्रवाल जी का घर | vinod agarwal house

वैसे तो बाउजी का बचपन दिल्‍ली, जवानी मुंबई और आध्‍यात्मिक जीवन वृन्‍दावन में बीता।

गोलोकधाम गमन करने के पहले वो गोविंद की गली, पुष्‍पांजलि वैकुण्‍ठ फेज-१, टेहरा रोड, वृन्‍दावन, उत्‍तर प्रदेश में रहते थे।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

वैसे मैं इसमें एक बात जोड़ना चाहता हॅू कि बाउजी हमेशा अपने भजनों के माध्‍यम से कहा करते थे कि मैं हरिनाम प्रचार नि:शुल्‍क करता हॅू, जिसमें न कोई गिफ्ट लेता हॅू और ना ही कोई सेवा,

तो यह जानकर आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि जब वे नि:शुल्‍क भजन संध्‍या कार्यक्रम किया करते थे तो वृन्‍दावन में उनका निवास स्‍थान ‘गोविंद की गली’ जो कि एक बहुत ही आलीशान बंग्‍ला है,

तो वह उन्‍होंने कैसे बनाया होगा ? तो आपकी इस जिज्ञासा का समाधान भी हम आगे करने वाले हैं।

Vinod Agarwal ji ki Family:

श्री विनोद अग्रवाल जी की माताजी का नाम स्‍व. श्रीमती रत्‍नी देवी जी था, जो अमृतसर की रहने वाली थी तथा उनके पिताजी का नाम स्‍व. श्री किशनदास जी था, जो हरियाणा के रहने वाले थे।



बाउजी के दो भाई व एक बहन हैं। दो भाइयों में एक भाई बाउजी से बड़े हैं और एक भाई उनसे छोटे हैं।

छोटे भाई का नाम श्री अशोक अग्रवाल जी है, जिनको आपने बाउजी के साथ ही अक्‍सर उनके लाइव भजन संध्‍या कार्यक्रमों में भजन गाते हुये देखा होगा।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

बाउजी के एक पुत्र व एक पुत्री भी हैं। पुत्र का नाम श्री जतिन अग्रवाल है और पुत्री का नाम श्रीमती शिखा अग्रवाल है।

वर्ष 2000 में उन्‍होंने अपने एकलौते पुत्र जतिन अग्रवाल का विवाह कर दिया, जिनके एक पुत्र व जुड़वा पुत्री हैं और जतिन अपने परिवार के साथ-साथ अपना व्‍यवसाय भी संभालते हैं।

श्री विनोद अग्रवाल जी का आध्‍यात्मिक सफर | vinod agarwal spruture journey

वैसे तो किसी व्‍यक्ति की आध्‍यात्मिक यात्रा उसकी आधी उम्र बीत जाने के बाद शुरु होती है,

लेकिन बाउजी (vinod agarwal) ऐसी दिव्‍य आत्‍मा थे, जिनकी आध्‍यात्मिक शुरुआत जन्‍म से ही शुरु हो गयी थी या यूं कहें कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात’

बाउजी की बचपन से ही संगीत में बहुत रुचि थी, जिसे उनके पिताजी ने पहचान लिया कि विनोद को गायकी भगवान ने उपहार स्‍वरूप प्रदान की है

इसलिए उन्‍होंने नन्‍हें विनोद से कहा कि बेटा तुम्‍हें अब हरि नाम का नि:शुल्‍क प्रचार करना है और इसके लिए तुम्‍हें किसी से कोई शुल्‍क या कोई गिफ्ट नहीं लेना है।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

बाउजी की संगीत के प्रति रुचि देखकर उनके पिताजी ने उन्‍हें हारमोनियम सीखने के लिए संगीत कक्षा में भेजना शुरु कर दिया।

उस समय बाउजी की उम्र महज 12 वर्ष की थी और उन्‍होंने केवल 02 माह ही हारमोनियम सीखा,

लेकिन उनके दिल और दिमाग में केवल संगीत और संगीत से प्रभु को रिझाने की कश्‍मकश चल रही थी

इसलिए उन्‍होंने हारमोनियम पर खुद से ही अतिरिक्‍त रियाज करना शुरू कर दिया और संगीत के प्रति उनकी लगन ने उन्‍हें कुछ ही दिनों में हारमोनियम का मास्‍टर बना दिया।  

पिता का विनोद को संदेश:-

बाउजी (vinod agarwal) जब 9-10 साल के थे, तब उनके पिताजी उन्‍हें ब्रम्‍हलीन स्‍वामी श्री अखंडानंद जी सरस्‍वती महाराज के सत्‍संग में ले जाया करते थे,

जहॉ वे 02 मिनट बाद ही सो जाया करते थे, क्‍योंकि सत्‍संग की बातें उनके पल्‍ले नहीं पड़ती थी।

उन्‍होंने अपने पिताजी से कहा कि सत्‍संग में उन्‍हें मत ले जाया करें, क्‍योंकि उनकी समझ में कुछ नहीं आता और उन्‍हें नींद आ जाती है तब उनके पिताजी ने कहा कि

‘बेटा तुम्‍हें 02 मिनट बाद नींद आ जाती है इसका मतलब है कि तुम 02 मिनट तो सत्‍संग सुनते ही हो, बस मेरा काम हो गया।

मेरा काम है तुम्‍हारे अंदर सत्‍संग का बीज डालना,वह बीज कब पेड़ बनकर दूसरों को फल,फूल व छाया देगा यह तो ईश्‍वर ही जाने, जो मेरा कर्तव्‍य है वह मैं कर रहा हूँ।


ईश्‍वर ने तुम्‍हें जो शक्ति दी है उसको हमेशा जनकल्‍याण में लगाना, अपने निजी स्‍वार्थों की पूर्ति उस शक्ति से कभी मत करना।’      

कथा स्‍टार के प्रिय पाठको, देखा आपने किसी महापुरुष के महापुरुष बनने की प्रक्रिया ज्‍यादातर उनके बचपन से ही शुरू हो जाती है,

ऐसे लोगों पर माता-पिता का आर्शिवाद तो होता ही है, साथ ही साथ ईश्‍वर की भी विशेष कृपा  रहती है।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

माता का विनोद को संदेश:-

बाउजी (vinod agarwal) के पूज्‍य माता-पिता भक्तिभाव से ओतप्रोत थे इसलिए उन्‍हें भी भक्ति का माहौल बचपन से ही मिला

और अपने माता-पिता से ईश्‍वर की भक्ति उन्‍हें आर्शीवाद के रूप में प्राप्‍त हुयी।

बाउजी की मॉ तो हमेशा भक्ति में ही लीन रहा करती थी और वे इतनी विनम्र व सरल स्‍वभाव की थी कि द्वेष क्‍या होता है, वे शायद जानती ही नहीं थी।

सरल होने का आशय यह है कि नवधा भक्ति की जब शुरू की आठों भक्ति मन में उतर जाये तब उनका फल नवमीं भक्ति होती है, यानी जीव सरल हो जाता है।

बाउजी की मॉ ने उन्‍हें सिखाया कि जीवन में कितने ही उपर चले जाओ, ईश्‍वर से उपर कभी नहीं जा सकते इसलिए जीवन में हमेशा सरलता, वाणी में मधुरता व स्‍वभाव में विनम्रता रखना।

जिनका पूज्‍य बाउजी अपने जीवन भर अनुशरण करते आये और कार्यक्रमों के दौरान जो भी लोग उनसे मिले होंगे वे इस बात को भलीभांति जानते होंगे

कि बाउजी का स्‍वभाव कैसा था। तो कुछ इस प्रकार की प्रेरणा उन्‍हें अपने माता-पिता से मिली।

उन्‍होंने स्‍वयं भी कई बार इस बात को स्‍वीकार किया है कि लोग अक्‍सर उनसे उनकी सफलता का राज पूछते हैं तो

उनकी सफलता का राज उनके माता-पिता का आर्शिवाद, माता-पिता का अखंड पुरुषार्थ और उनके सद्गुरु का सानिध्‍य है, जिसकी वजह से वे इस मुकाम पर पहुंचे हैं।

विनोद अग्रवाल जी के सद्गुरु | vinod agarwal ke guru

कहा जाता है कि ग्रहस्‍थ जीवन में गुरू बनाना जरूरी होता है। बाउजी (vinod agarwal) हमेशा कहा करते थे

कि गुरु हम स्‍वयं अपनी इच्‍छा से बनाते हैं, जबकि सद्गुरू हमारे जीवन में अपने आप आते हैं।

दूसरे शब्‍दों में कहें तो सद्गुरू का अपने आप ही हमारे जीवन में पर्दापण होता है।



बाउजी, एक महापुरुष से बहुत ही प्रभावित थे, जिन्‍हें वे अपना गुरु बनाना चाहते थे तथा उनसे दीक्षित होकर अपने जीवन की आगे की यात्रा करना चाहते थे,

इसके लिए उन्‍होंने अपने पिताजी से कहा तो उनके पिताजी ने कहा बेटा तुम बचपन से ही भजन संर्कीतन में रुचि रखते हो इसलिए तुम्‍हें गुरु बनाने की बड़ी तीव्र इच्‍छा हो रही है,

लेकिन मेरे विचार से तुम्‍हें अभी इंतजार करना चाहिए। बाउजी ने अपने पिताजी की बात मान ली।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

बठिंडा के रहने वाले महापुरूष, प्रसिद्ध संकीर्तन सम्राट, स्‍वामी श्री मुकुंदहरि जी महाराज अक्‍टूबर 1978 में 03 दिनों के लिए मुंबई आये

और जहां वे ठहरे थे वहां संयोग से बाउजी भी गये और उन्‍होंने पहली बार स्‍वामी श्री मुकुंदहरि जी महाराज के दर्शन किये

और दर्शन करते ही उनका रोम-रोम रोमां‍चित हो गया और उनके मन में जोर-जोर से एक ही आवाज गूंजने लगी कि विनोद यही तेरी मंजिल हैं।

इसके बाद बाउजी तीनों दिन वहां गये और महाराज का दर्शन लाभ लेते रहे।

जब चौथे दिन महाराज जी जाने लगे तब बाउजी ने उनसे निवेदन किया कि वे उनसे दीक्षा लेना चाहते हैं और अपने आप को उन्‍हें समर्पित कर देना चाहते हैं।

लेकिन, प्रिय पाठको, सच्‍चा गुरू वही होता है जो हर किसी को आसानी से उपलब्‍ध नहीं हो जाता है। उसका होने से पहले वह सामने वाले को नापता तोलता है,

उसे टटोलता है, उसकी ईश्‍वर के प्रति आस्‍था, प्रीति, प्‍यार और वेदना को महसूस करता है तब कहीं जाकर उसे अपना सानिध्‍य प्रदान करता है।’

ठीक वैसे ही स्‍वामी श्री मुकुंदहरि जी महाराज ने तुरंत दीक्षा देने से इंकार कर दिया और कहा कि अभी इंतजार कर।

बाउजी को उनकी बात समझ में तो नहीं आयी, परंतु चूंकि वे उन्‍हें अपने आप को समर्पित कर देना चाहते थे इसलिए उन्‍होंने इंतजार किया।

वर्ष 1979 की बात है, एक बार बाउजी vinod agarwal अपने मंडल के साथ किसी धाम की यात्रा पर गये थे, जहॉ स्‍वामी श्री मुकुंदहरि जी महाराज भी आये हुये थे,

वहॉ उन्‍होंने बाउजी की गतिविधियों, संगीत के प्रति उनकी रुचि और ईश्‍वर के प्रति उनके प्रेम को देखा और खुश होकर बाउजी को दीक्षित किया

और उन्‍हें यह आदेश दिया कि वत्‍स तुम्‍हें पूरे संसार में हरि नाम का प्रचार करना है और इसके लिए तुम्‍हें किसी से कोई दक्षिणा या गिफ्ट नहीं लेना है।

उस समय बाउजी vinod agarwal  24 साल के थे। उन्‍होंने अपने गुरुदेव के आदेश को अपने जीवन का लक्ष्‍य बना लिया और उसी काम में लग गये।

गुरू और सद्गुरू में अंतर:-

बाउजी (vinod agarwal) कहा करते थे कि गुरू हमें मंत्र के रूप में बीज देते हैं, जिसे हमें लगाना होता है, फिर उससे पौधा निकलेगा, उसमें हमें ही खाद, पानी डालना पडेगा, हमें ही उसकी देखभाल करनी होगी,

उसे प्रकाश उपलब्‍ध कराना होगा, उसे जानवरों कीड़ों से बचाना होगा तब कहीं जाकर वह पौधा, पेड़ बनेगा, फिर उसमें फल आयेंगे

और जब फल पक जायेंगे और उनमें रस आ जायेगा तब हम उस फल को खा पायेंगे और फल के रस का आनंद ले पायेंगे।

जबकि सद्गुरू हमें सीधा लगा लगाया पेड़ ही दे देते हैं और कहते हैं कि वत्‍स ये लो, ये फलदार पेड़ मैं तैयार करके तुम्‍हें दे रहा हॅू



इसके फलों को पहले समाज में वितरित करो और अंत में जब फल बचे तब तुम खाना।

कथा स्‍टार के प्रिय पाठको, मैं आशा करता हॅू कि पूज्‍य बाउजी की यह बात पढ़कर अब आप पूरी तरह से समझ चुके होंगे कि गुरू और सद्गुरू में क्‍या अंतर होता है।

विनोद अग्रवाल की उनके सद्गुरू के प्रति आस्‍था:-

बाउजी की अपने सद्गुरु के प्रति आस्‍था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे कहा करते थे कि

जब वे कोई प्रोग्राम करने घर से निकलते थे तो उन्‍हें लगता था कि उनके गुरु आकाश मार्ग से उनके साथ चल रहे हों

और कह रहे हों कि ‘स्‍टेज पर तुझे केवल हारमोनियम पकड़ना है, गाना तो मुझे है। माईक में होठ तेरे हिलेंगे, पर शब्‍द मेरे होंगे।’

और आप सब यह जानकर हैरान हो जायेंगे कि केवल यही एक कारण था कि बाउजी कोई भी भजन संध्‍या कार्यक्रम करने से पहले

अपने साथियों के साथ घर पर या स्‍टेज के पीछे रिहर्सल नहीं किया करते थे, बल्कि उन्‍हें खुद पता नहीं होता था कि वे आज के प्रो्ग्राम में क्‍या गाने वाले हैं।

बाउजी और उनके सद्गुरू का शारीरिक रूप में ज्‍यादा साथ नहीं रहा, क्‍योंकि बाउजी ने वर्ष 1979 में सद्गुरू महाराज से दीक्षा प्राप्‍त की एवं वर्ष 1986 में गुरुदेव  शरीर शांत हो गया।

शारीरिक रूप में गुरूदेव से साल में केवल एक या दो बार ही मुलाकात होती थी, लेकिन सद्गुरू की आध्‍यात्मिक चेतना सदा उनके साथ रही।

बाउजी vinod agarwal ने अपने माता-पिता से तो सत्‍संग, भक्ति व आध्‍यात्‍म का ज्ञान लिया ही,

विनोद अग्रवाल की जीवनी

इसके अलावा उन्‍होंने ब्रम्‍हलीन स्‍वामी श्री अखंडानंद जी सरस्‍वती, साकेतवासी मानस मर्मज्ञ पंडित श्री रामकिंकर जी उपाध्‍याय,

वृन्‍दावन के गोस्‍वामी गोलोकवासी श्री अतुल कृष्‍ण जी व हरिद्वार के संत स्‍वामी श्री अखंडानंद जी गिरि के सत्‍संग व उनके द्वारा लिखित ग्रंथों का अध्‍ययन करके अपनी आध्‍यात्मिक यात्रा को और प्रगाढ़ बनाया।

इसके साथ-साथ वे साकेतवासी मानस मर्मज्ञ श्री राजेश्‍वरानंद जी ‘राजेश रामायणी जी’ महाराज के अमूल्‍य वचनों को अपने भजनों में समाहित किया करते थे।

बाउजी  (vinod agarwal) बताते थे कि अपने गुरू के आदेश पालन हेतु उन्‍होंने अचानक से ही भजन संध्‍या कार्यक्रम करना शुरु नहीं किया था,

बल्कि जहॉ वे काम करते थे, उन्‍होंने वहीं संकीर्तन करना शुरू कर दिया था और आसपास के जो कारखाने थे उनमें भी खाली समय में जाकर वे संकीर्तन किया करते थे



और छुट्टी के दिन अपने घर, आस पड़ौस व मुहल्‍ले में संकीर्तन किया करते थे, लेकिन वे केवल संकीर्तन ही किया करते थे,

ऐसी बात नहीं है, उन्‍होंने अपने ग्रहस्‍थ जीवन के कर्तव्‍यों को भी बड़े ही कुशल तरीके से निभाया,

क्‍योंकि उन पर उनकी पत्‍नी और दो बच्‍चों की भी जिम्‍मेदारी थी, जिनके लिए भी वे पर्याप्‍त समय निकाल लिया करते थे और

अपने आंतरिक व मानसिक जीवन के लिए भी समय निकाल लिया करते थे। और ऐसे उनकी आध्‍यात्मिक यात्रा शुरू हुयी।

विनोद अग्रवाल के आध्‍यात्मिक यात्रा के विशेष साथी श्री बल्‍देव कृष्‍ण जी सहगल के बारे में:-

उपरोक्‍त लिखित जानकारी के अनुसार बाउजी का जीवन कुछ सालों तक ऐसे ही चलता रहा, फिर उनकी मुलाकात एक सख्‍श से होती है, जिनका नाम है श्री बल्‍देव कृष्‍ण सहगल, जगादरी वाले  हैं ।

जिन्‍हें आप बाउजी के लगभग हर प्रोग्राम में उनके बगल में बैठा हुआ पायेंगे, जो लगभग 25 साल तक बाउजी के साथ रहे, 25 साल क्‍या बल्‍देव जी तो बाउजी की अंतिम सांस तक उनके साथ रहे।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

उन्‍होंने ही वर्ष 1993 में बाउजी को प्रोत्‍साहित किया था कि विनोद अब तुम संकीर्तन करने के लिए मुंबई से बाहर निकलो।

चूंकि बाउजी (vinod agarwal) तो व्‍यवसायी थे और अपने पिता के साथ बिजनेस में ही लगे रहते थे और बिजनेस के सिलसिले में दूसरे शहरों की यात्रा किया करते थे,

लेकिन संकीर्तन करने के उद्देश्‍य से वे कभी भी मुंबई से बाहर नहीं गये थे इसलिए बल्‍देव जी ने ही बाउजी के पिताजी से यह इजाजत मांगी कि

वे अब विनोद को लाइव संकीर्तन करने के लिए मुंबई से बाहर जाने दें और उनके पिताजी की तो यही इच्‍छा ही थी इसलिए उन्‍होंने मुस्‍कुराकर अपनी सहज स्‍वीकृति प्रदान कर दी।

बाउजी एक बार अपने बिजनेस के काम से अमृतसर जा रहे थे, चूंकि बल्‍देव जी ने पहले से ही पूरी तैयारी कर रखी थी

इसलिए रास्‍ते में ही बल्‍देव जी ने बाउजी (vinod agarwal) को जगादरी अपने घर चलने को कहा और फिर वहॉ से यमुनानगर ले गये,

क्‍योंकि वहॉ बाउजी का लाइव कार्यक्रम होना था और यही, श्री विनोद अग्रवाल जी का पहला लाइव संकीर्तन कार्यक्रम था

और उसी तारीख को रात में पानीपत में भी लाइव संकीर्तन कार्यक्रम किया और यहीं से विनोद अग्रवाल की, भजन सम्राट विनोद अग्रवाल बनने की यात्रा का शुभारंभ हुआ।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

बल्‍देव जी और बाउजी के बीच में आत्‍मीय संबंध इतना प्रगाढ़ था कि स्‍टेज पर जब कभी भजन गाने के दौरान बाउजी कोई भजन की लाइन या संकीर्तन भूल जाया करते थे

तो बल्‍देव जी तुरंत ही उस पंक्ति को याद दिला दिया करते थे या स्‍वयं ही गा दिया करते थे जिससे संकीर्तन की लय न टूटे और फिर आगे बाउजी संभाल लिया करते थे।

इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि बाउजी के भजन सम्राट बनने की यात्रा में बाल्‍देव जी सहगल का कितना उच्‍च योगदान रहा है, जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकता है।

इस बात को बाउजी स्‍वयं स्‍वीकार करते थे कि उनकी संकीर्तन की यात्रा में यदि भौतिक रूप से किसी का योगदान है तो वे हैं श्री बल्देव जी।

विनोद अग्रवाल के संकीर्तन टीम के बारे में कुछ जानकारी:-

बाउजी का यह मानना था कि जो भी उनकी टीम से जुड़ जाये वो हमेशा उनके साथ टीम में बना रहे,

इस प्रकार बाउजी की टीम में आरंभ से लेकर अंतिम दिनों तक लगभग-लगभग टीम के सदस्‍य वही थे, जिन्‍हें शुरुआत में उन्‍होंने चुना था।

अगर टीम के सदस्‍यों की भूमिका के बारे में बात की जाये तो सबसे पहले नाम आता है श्री बल्‍देव जी का, जिनके बारे में आप पूर्व पंक्तियों में पढ़ चुके हैं।        



        टीम के अन्‍य सदस्‍यों के नाम व उनकी भूमिका इस प्रकार है-

  • श्री प्रेम सहगल- कोरस
  • श्री मुरली सहगल- कोरस
  • श्री मनदीप सिंह जॉली- तबला वादक
  • श्री नरेन्‍द्र जरौरा- ढोलक वादक

विनोद अग्रवाल का मुंबई से वृन्‍दावन निवास करने तक का रोचक सफर:-

चूंकि बाउजी (vinod agarwal) पेशे से व्‍यापारी थे और अपने माता-पिता के साथ पत्‍नी और दो बच्‍चों की भी जिम्‍मेदारी थी

इसलिए व्‍यापार के साथ-साथ संकीर्तन के लिए भी समय निकालना उनके लिए बड़ा ही दुष्‍कर कार्य था,

लेकिन उन्‍होंने अपनी बुद्धिमत्‍ता एवं ईश्‍वर की प्रेरणा से सारे कर्तव्‍यों का ठीक तरीके से निर्वहन किया। व्‍यापार में अधिक व्‍यस्‍तता होने के कारण वर्ष 1993 में उन्‍होंने मात्र 05 लाइव कार्यक्रम ही किये।

वर्ष 1994 में उन्‍होंने अपने आप को समय की कसौटी पर कसा और व्‍यापार को संभालते हुये उस साल उन्‍होंने 10 लाइव कार्यक्रम किये और

इसी तरह वे अपने लाइव भजन संध्‍या कार्यक्रमों की संख्‍या बढ़ाते गये

और लोग उनके भाव भरे भजनों को बहुत पसंद करने लगे तथा धीरे-धीरे हर रसिक के होठों पर भजन गायक विनोद अग्रवाल का नाम आने लगा।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

इस प्रकार बाउजी वर्ष 1994 से लेकर वर्ष 2000 तक ऐसे ही अपने जीवन की यात्रा का आनंद लेते रहे।

इसी बीच वर्ष 1995 से 1998 के मध्‍य बाउजी vinod agarwal की पूज्‍य माताजी एवं पूज्‍य पिताजी का देहावसान हो गया।

वर्ष 2000 में उन्‍होंने अपने एकलौते पुत्र जतिन अग्रवाल का विवाह कर दिया और जतिन अपने परिवार के साथ-साथ अपना व्‍यवसाय भी संभालने लगे,

इसी बीच उन्‍होंने अपनी पुत्री का भी विवाह कार्य संपन्‍न कर दिया, जिससे बाउजी की आधी जिम्‍मेदारी खत्‍म हो गयी।

बाउजी पहले तो 01 म‍हीने में 05 कार्यक्रम ही दिया करते थे, क्‍योंकि उन्‍हें अपना परिवार भी देखना होता था और अपना व्‍यवसाय भी,

किंतु जतिन को जिम्‍मेदारी सौंपने के बाद वर्ष 2000 के बाद बाउजी ने एक महीने में अपने लाइव प्रोग्राम की संख्‍या 5 से बढ़ाकर  07 कर दी,

क्‍योंकि बाउजी (vinod agarwal) का मानना था कि दुनिया, समाज, परिवार से तो मांगना दूर की बात है,

यदि हम अपने बच्‍चों से भी न मांगे तो ही हमारी खुद्दारी और स्‍वाभिमान बचा रह सकता है।

जीते जी ईश्‍वर के अलावा किसी और के सामने हाथ फैलाना अच्‍छा नहीं लगता।

इसलिए उन्‍होंने अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारी का पूर्णरूपेण निर्वहन करते हुये, दोनों बच्‍चों की शादी कर दी। जब बाउजी के नाती पोता 6-7 साल के हो गये,

तब उन्‍होंने एक दिन अपनी पत्‍नी से कहा कि इस शरीर पर पहला अधिकार तो माता-पिता का होता है, जो अब रहे नहीं, और दूसरा अधिकार तुम्‍हारा है। यदि तुम्‍हें कोई आपत्ति न हो तो ही मैं वृन्‍दावन जाकर वास करूंगा,

यह सुनकर उनकी पत्‍नी ने भी उनके साथ वृन्‍दावन चलने की बात कही और दोनों ही वर्ष 2012 में अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों को पूर्ण करके श्री धाम वृन्‍दावन आ गये, जहॉ दोनों खुशी-खुशी रहने लगे।

श्री विनोद अग्रवाल जी का समाज को संदेश:-

  • बाउजी (vinod agarwal) का कहना था कि हर इंसान का तीन तरह का जीवन होता है, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन व आध्‍यात्‍मिक जीवन।
  • पारिवारिक जीवन में समस्‍यायें तब आती हैं जब हम संग्रह करना शुरू कर देते हैं कि हर चीज, हर उपलब्धि मुझे ही मिले, अपने भाई-बंधु का हिस्‍सा भी मुझे ही मिले।
  • संग्रह में ही संघर्ष होता है, त्‍याग में नहीं। इसलिए यदि हम त्‍याग करना सीख लेते हैं तो हमारा पारिवारिक जीवन सफल हो जायेगा।
  • सामाजिक जीवन को सफल बनाने के लिए हमें बिना किसी प्रलोभन, बिना किसी लालच के नि:स्‍वार्थ भाव से समाज की सेवा करनी होगी, जिसे राष्‍ट्र सेवा भी कहा जा सकता है।
  • और रही बात आध्‍यात्‍मिक जीवन की तो हम परिवार, नाते रिश्‍तेदारों में न अटक कर केवल ईश्‍वर से प्‍यार करें तो हमारा आध्‍यात्मिक जीवन भी सफल हो जायेगा। ये तीनों चीजें हमारे ही हाथ में हैं अर्थात् शुरूआत हमें ही करनी होगी।
  • बाउजी अपने भजन संध्‍या कार्यक्रमों में भी इस बात को संक्षिप्‍त रूप में अक्‍सर कहा करते थे कि –‘त्‍याग खुद करें, सेवा दूसरों की करें और प्‍यार केवल ईश्‍वर से करें।

श्री विनोद अग्रवाल को भगवान शिव के दर्शन होने की सच्‍ची घटना:-

बाउजी vinod agarwal अपने एक भजन में इस सच्‍ची घटना को बताना तो नहीं चाहते थे, लेकिन भाव में आकर उन्‍होंने बताया कि वे एक बार चार धाम यात्रा के लिए उत्‍तराखंड गये थे, जिसमें उनके साथ उनकी पत्‍नी भी थी।

एक दिन केदारनाथ के दर्शन करने के लिए निकले तभी रास्‍ते में उनके पैर में मोच आ गयी थी तो पास के पड़े एक पत्‍थर पर बैठ गये और कुछ समय बीत जाने के बाद उनके शरीर से पसीना निकलने लगा

और जिस पत्‍थर पर वो बैठे थे, वह गर्म हो गया और वो अपने कपड़े निकालकर अपनी पत्‍नी को देने लगे जबकि वहॉ पहाड़ों पर हल्‍की-हल्‍की बर्फ जमी हुयी थी जिससे काफी ठंड का माहौल था।



जब उन्‍होंने आकाश की ओर देखा तो उन्‍हें शिवजी का पूरा परिवार जिसमें मॉ पार्वती, कार्तिकेय व गणेश उनको साक्षात दिखाई दे रहे थे।

और उसी दृश्‍य के कुछ ही दूरी पर उनके गुरूजी खड़े मुस्‍कुरा रहे थे। इस प्रकार भगवान शिव सिर्फ उन्‍हीं को दिखाई दिये, ना कि उनकी पत्‍नी को।

कुछ समय बीत जाने के बाद उनकी शरीर की गर्मी शांत हुयी और उन्‍होंने अपने वस्‍त्र पुन: धारण किये और जिस मोच की वजह से वे लंगड़ा रहे थे

वह पूरी तरह ठीक हो गयी थी। यह चमत्‍कार देखकर उनकी पत्‍नी भी आश्चर्य चकित रह गयी और बाउजी अपने कमरे की ओर बहुत ही तेज गति से चल दिये। 

श्री विनोद अग्रवाल जी के बेस्‍ट भजन:-

  1. मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है।
  2. जगत के रंग क्‍या देखूं।
  3. राधिका गोरी से, बिरज की छोरी से।
  4. फूलों में सज रहे हैं श्री वृन्‍दावन बिहारी।
  5. क्‍यों आके रो रहा है गोविंद की गली में।
  6. कहा प्रभु से बिगड़ता क्‍या।
  7. गोपाल मुरलिया वाले, नंदलाल मुरलिया वाले।
  8. सांवरिया आ जइयो इन नैनन के तीर।
  9. इक नजर कृपा की कर दो।
  10. जहॉ ले चलोगे वहीं मैं चलूंगा।
  11. देखो भिखारी आया मोहन तेरी गली में।
  12. मैं तो मिलन की प्‍यासी धारा।  
  13. किससे नजर मिलाउं, तुम्‍हें देखने के बाद। 
  14. देर भई अब आजा रे सांवरिया। 
  15. आ जाओ मेरे श्‍याम सलोने।
  16. चित चोर ग्‍वाले आ भी जा।
  17. आ जा रे कन्‍हाई तेरी याद आई। 
  18. तेरा शुक्रिया है तेरा शुक्रिया। 
  19. गोपाल सांवरिया मेरे, नंदलाल सांवरिया मेरे।
  20. आज भी आम हैं उनके जलवे।

इसके अतिरिक्‍त Vinod Agarwal Best Bhajan आपको UTube पर कई सारे चैनलों पर मिल जायेंगे।

भजन सम्राट श्री‍ विनोद अग्रवाल जी के मन के विचार:-

  1. कोई अज्ञात शक्ति इस शरीर को माध्‍यम बनाकर अपना काम कर रही है।
  2. शरीर से आत्‍मा की ओर चलना ही आध्‍यात्‍म है।
  3. धर्म और आध्‍यात्‍म दोनों अलग-अलग चीजें हैं।
  4. सबसे बड़ा धर्म- स्‍वधर्म है कि मेरा कर्तव्‍य, मेरा फर्ज, मेरी ड्यूटी क्‍या है।
  5. जीवन में आज अच्‍छा समय चल रहा है तो बुरा समय भी निश्चित ही आयेगा।
  6. सबसे पहले हमें अपने दोषों को स्‍वीकार करना होगा। अपने दोषों को स्‍वीकार किये बिना गुरू, संत या ईश्‍वर हमारी कोई मदद नहीं करते।
  7. पहले हम अपने अंदर के दुर्गुण व दुर्विचार को स्‍वीकार करें इसके बाद गुरू, संत या ईश्‍वर का काम शुरू होता है।
  8. जीवन चुनौतियों से भरा है, विश्‍व में ऐसा कोई व्‍यक्ति नहीं जो नीचे से उपर न गया हो और उपर जाकर नीचे न आया हो।
  9. जीवन में उतार चढ़ाव, नौक-झौंक होनी चाहिए, तभी जीवन का मजा है।
  10. ईश्‍वर की याद और ईश्‍वर का नाम, इन दो अलावा तीसरी चीज की मुझे कोई जरूरत नहीं है।
  11. ईश्‍वर का अनुभव मैंने नहीं किया, उसने ही करवाया।
  12. हमें ईश्‍वर से यही प्रार्थना करना चाहिए कि हमारा जीवन कामनारहित हो।
  13. जब मेरे सारे कष्‍ट उसने ले लिये तो मैं क्‍यों न खुश रहॅू।
  14. अधिकांश लोगों को यह ही नहीं पता कि हम क्‍यों जी रहे हैं, हमें जीवन में करना क्‍या है, इसलिए पहले अपना लक्ष्‍य तय करें।
  15. ऋषि यानी साइंटिस्‍ट और शास्‍त्र यानी उनके रिसर्च की रिपोर्ट।
  16. कलयुग के अंदर केवल भगवान का नाम जप ही है, जो हमें भगवान तक पहुंचा सकता है, बसरते नाम में मिलन की पीड़ा और वेदना मिली होना चाहिए।
  17. जहॉ प्रेम है, वहॉ समर्पण भी होगा और अधिकार की वृत्ति भी होगी।
  18. गुरु बनाये जाते हैं और सद्गुरु अपने आप ही हमारे जीवन में आते हैं।

श्री विनोद अग्रवाल जी की सादगी:-

बाउजी (vinod agarwal) अपने जीवन में बहुत सादगी से रहे। वे अपने भजनों में कभी भी रंग बिरंगे कपड़ों का उपयोग नहीं करते थे

और उनके भजनों के पीछे जो संगीत सिस्‍टम था, वह बहुत ही सिम्‍पल था या यूं कहें कि शोर शराबा बिल्‍कुल ही नहीं था, केवल और केवल मधुरता ही झलकती थी

Vinod Agarwal Biography In Hindi (10)

इसीलिए श्रोता भी तबले की तान पर सिर हिलाते देखे जाते थे। बाउजी ज्‍यादा फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी कराने से बचते थे,

जब कभी स्‍टेज के सामने फोटोग्राफर कई बार फोटो लेने के लिए प्रयास करते तो बाउजी साफ मना कर देते थे कि जो भी फोटो लेना है एक बार ले लें, बार-बार नहीं,

क्‍योंकि उनका मानना था कि भजन संध्‍या एक रसधारा है, जो बह रही है, जिसको भी उस रसधारा में डुबकी लगाना है वो लगाता रहे और आनंद लेता रहे।   

श्री विनोद अग्रवाल जी की अंतिम यात्रा:-

वर्ष 2012 में वे (vinod agarwal) श्री धाम वृन्‍दावन आ गये और अपने जीवन की अंतिम सांस उन्‍होंने वृन्‍दावन में ही ली।

बात है 05 नबम्‍बर 2019 की। वो उस समय ‘गोविंद की गली’ वृन्‍दावन में ही निवासरत थे कि अचानक रात में उनके सीने में दर्द होने लगा, जिस कारण उन्‍हें मथुरा के नियति अस्‍पताल में भर्ती कराया गया

और अगले दिन सुबह 11 बजे यानी  06 नबम्‍वर 2019 को उनका गोलोकधाम गमन हो गया।

विनोद अग्रवाल की जीवनी

वो अपने अंतिम दिनों में यह बात अवश्‍य दोहराया करते थे कि अब उनका मन ब्रज धाम को छोड़कर बाहर जाने का नहीं करता है

और उनकी अंतिम इच्‍छा भी यही थी कि अपना शरीर त्‍यागते समय मैं वृन्‍दावन धाम में ही रहूं और शायद बांके बिहारी जी ने उनकी ये इच्‍छा पूरी कर दी।

वैसे सशरीर हमारे बीच बाउजी (vinod agarwal) भले ही न हो, लेकिन उनके भजन आज भी हमारे बीच उनकी यादों को नवनिर्मित किये हुये हैं।

उनकी याद में हर वर्ष 06 नबम्‍वर को ‘गोविंद की गली’ वृन्‍दावन में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

‘गोविंद की गली’ का मालिक कौन है?

जैसा कि मैंने शुरुआत के पैरा में कहा था कि आपको आगे बताने वाले हैं कि जहॉ बाउजी (vinod agarwal) निवास किया करते थे, वह आलीशान मकान किसका है।



यह प्रश्‍न बहुत से लोगों के मन में उठना लाजिमी है, क्‍योंकि जब बाउजी भजन कार्यक्रम में स्‍टेज से कहा करते थे

कि मैं हरिनाम प्रचार करने के लिए कोई शुल्‍क या फिर कोई गिफ्ट नहीं लेता हॅू तो फिर वृन्‍दावन में ‘गोविंद की गली’ नामक मकान को कैसे बनवाया?

तो आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि ‘गोविंद की गली’ बड़े व्‍यवसायी और बाउजी के अनन्‍य भक्‍त की है। जो अक्‍सर उनके भजनों में पीछे बैठे दिखाई पड़ जाते हैं।

बाउजी vinod agarwal के चाहने वाले उन्‍हें बहुत कुछ देने की कोशिश करते थे, लेकिन वो साफ मना कर देते थे।

बड़े व्‍यवसायी  जी के बार-बार कहने पर उन्‍होंने वृन्‍दावन में ‘गोविंद की गली’ को अस्‍थायी निवास बनाया था और

वो हमेशा कहा करते थे कि हर प्राणी का स्‍थायी निवास भगवतधाम में होता है, जिसे हमेशा ध्‍यान में रखना चाहिए।

उनके द्वारा शुरु किया गया भगवन नाम संकीर्तन आज भी ‘गोविंद की गली’ में सुबह और शाम प्रज्‍जवलित हो रहा है।



अब मुझे आशा है कि श्री विनोद अग्रवाल जी के जीवन से संबंधित जो भी जानकारियॉ थी वो लगभग-लगभग आपको पढ़ने को मिल गयी होगी और मेरा प्रयास आपको पसंद आया होगा।

मैं आपसे एक बात जरूर कहना चाहॅूंगा कि मेरे द्वारा लिखा गया हर लेख बहुत प्रमाणिक जानकारी के साथ प्रस्‍तुत किया जाता है,

जिसके लिए कड़ी मेहनत करती पड़ती है इसलिए आपसे आशा है कि आप अपना अनुभव या सुझाव हमारे साथ जरूर शेयर करेंगे,

क्‍योंकि हम आपके सुझाव या अनुभव का इंतजार करते हैं। अगर आपको लगता है कि ऐसी महान सख्‍शियत की जानकारी और भी लोगों तक पहुंचायी जाये तो

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Vinod Agarwal Biography In Hindi लेख पढ़ने के लिए धन्‍यवाद।


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