Dr Shyam sunder Parashar Biography In Hindi | श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

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दोस्‍तो, Dr Shyam sundar Parashar Ji Maharaj Biography (डॉ श्‍याम सुंदर पाराशर जी महाराज) भागवत कथा कहने वाले एकमात्र ऐसे कथावाचक हैं,



जिनकी कथा में स्‍वयं माता सरस्‍वती बिराजती हैं और उन्‍हीं की कृपा से आज पाराशर जी की कथा सुनकर भारत में नहीं, अपितु पाकिस्‍तान में भी कथावाचक तैयार हो रहे हैं।

Dr Shyam sunder Parashar Biography In Hindi

 

ऐसे महान कथावाचक और अमृतवाणी के धनी पाराशर जी महाराज के जीवन से संबंधित हर वो छोटी-बड़ी जानकारी (shyam sundar parashar Biography)

इस लेख में बहुत सरल भाषा में हम आपको बताने जा रहे हैं। जिसे जानकर आप आनंद की अनुभूति करेंगे और रोचकता से आपका मन रोमांचित हो उठेगा।  

Dr Shyam sundar Parashar Date of Birth (डॉ श्‍याम सुंदर पाराशर की जन्‍मतिथि‍):-

इस पोस्ट मे क्या है देखो

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) का जन्‍म मध्‍यप्रदेश के ग्‍वालियर जिले में पार्वती नदी के तट पर स्थित ग्राम भितरवार में 08 जून 1967 को हुआ था।

Shyam sundar Parashar Family (श्‍याम सुंदर पाराशर जी का परिवार):-

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) के पिताजी का नाम श्री भगवान लाल जी और माताजी का नाम श्रीमती विमला देवी जी है। महाराज जी के पिताजी सरकारी नौकरी में सेवारत हैं।



महाराज दो भाई हैं, जिनमें महाराज जी छोटे हैं, उनके बड़े भाई का नाम बृजकिशोर पाराशर जी है, वे भी सरकारी नौकरी में सेवारत हैं।

पाराशर जी कथा

इसके अतिरिक्‍त महाराज जी के परिवार में उनकी पत्‍नी व तीन बच्‍चे हैं, जिनमें दो पुत्रियॉ और एक पुत्र है,

जो वर्तमान में महाराज जी (Shyam sundar Parashar) के ही साथ पाराशर आध्‍यात्‍म पीठ वृन्‍दावन, उत्‍तर प्रदेश में निवासरत हैं।

पाराशर जी की शिक्षा (Parashar Ji):-

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा एवं श्रीमदभागवत, व्‍याकरण व संस्‍कृत की शिक्षा वेदमूर्ति श्री राजवंशी द्विवेदी द्वारा श्री धर्म संघ संस्‍कृत विद्यालय रमणरेती, वृन्‍दावन से प्राप्‍त की। 

इसके बाद रूहेलखंड विश्‍वविद्यालय बरेली, उत्‍तर प्रदेश से भागवत महापुराण पर विद्या वाचस्‍पति से पीएचडी करके डॉक्‍टर की उपाधि प्राप्‍त की है तथा सांगोपांग शास्‍त्रीय संगीत का भी अध्‍ययन किया है।

महान धर्मगुरुओं द्वारा पाराशर जी को विद्वन मार्तण्‍ड, भागवतमहामहोपाध्‍याय, रसेस आदि उपाधियॉ भी दी गयी हैं।


Dr Shyam sunder Parashar wikipedia:-

पाराशर जी की जन्‍म तिथि 08 जून 1967
जन्‍म स्‍थान ग्‍वालियर जिले में
मोबाइल नंबर 8299381102,  9837026101
Email[email protected]
Official YouTube ChannelBhagwat Kalpdrum
Twitter DrShyamSundarP1
InstagramDr_shyamsundar_parashar
Official  Websitehttp://ssparashar.org/
वर्तमान निवास का पता 334 फेज 1, चैतन्‍य बिहारी कॉलोनी, वृन्‍दावन, उत्‍तर प्रदेश।

पाराशर जी  की आध्‍यात्‍मिक यात्रा:-

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) बचपन से ही बड़ी कुशाग्र बुद्धि के थे या यूं कहें कि भगवान की उनपर विशेष कृपा थी। उन्‍हें बचपन से ही भगवान के प्रति बहुत लगाव था।

उनके घर के पास प्रभु श्रीराम चन्‍द्र जी का एक छोटा सा मंदिर था, जिसमें वे बचपन में जाकर पूजा किया करते थे और ठाकुरजी की सेवा किया करते थे।

चूंकि मंदिर बहुत ही पुराना था और जीर्ण-शीर्ण अवस्‍था में था इसलिए नन्‍हें पाराशर जी मन में सोचते थे कि जब बड़े होकर उनकी नौकरी लग जायेगी

और पैसा कमाने लगेंगे तो मंदिर का भव्‍य निर्माण करवायेंगे।

पूजा पाठ में उनकी रुचि होने के कारण ठाकुर जी से उनका भावनात्‍मक संबंध बचपन में ही जुड़ गया था और धार्मिक भाव मन में जागृत होने लगा था।  

पाराशर का जीवन परिचय

उनका कोई विशेष लक्ष्‍य नहीं था कि बडे होकर क्‍या बनना है। उनके दादाजी अध्‍यापक थे और साथ ही ज्‍योतिष के प्रकाण्‍ड विद्वान भी थे

इसलिए पूरे क्षेत्र के लोग उनसे ज्‍योतिष की जानकारी लेने अक्‍सर ही आया करते थे

और उनके दादाजी को ज्‍योतिष का इतना ज्ञान था कि बिना पंचाग व पोथी पत्रा के केवल अंगुलियों पर ही गृह नक्षत्रों को गिन कर गणना कर दिया करते थे

जिससे पूरे क्षेत्र के लोग उनसे बहुत प्रभावित थे। चूंकि महाराज जी के पिता सरकारी नौकरी में थे

इसलिए गॉव के लोग चाहते थे कि महाराज जी के दादाजी की जो विद्या है, वह परम्‍परागत रूप से आगे की पीढियों को मिलनी चाहिए

इसलिए महाराज (Shyam sundar Parashar) के पिता जी से कहा गया कि आप अपने दोनों पुत्रों में से किसी एक को ज्‍योतिष की पढाई करवाइये।

पिताजी ने निर्णय लिया कि महाराज जी के बडे भाई बृजकिशोर पाराशर, जो उस समय 17 साल के थे, उनको ज्‍योतिष की पढाई के लिए चुना गया।



महाराज जी उम्र उस समय महज 12 साल थी। उस समय बडे भाई का विवाह हो चुका था।

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) को अचानक वृन्‍दावन क्‍यों जाना पड़ा:-

उस दिन पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) को ज्‍वर आ गया। चूंकि मंदिर की पूजा अर्चना करने की जिम्‍मेदारी महाराज जी की ही थी

इसलिए उनके पिताजी ने उनके बडे भाई से कहा कि आज पूजा तुम करना और इतना कहकर वे नौकरी पर चले गये।

शाम को वापस आकर उन्‍होंने पूजा के बारे में अपने बडे लडके से पूछा तो उन्‍होंने कहा कि पूजा करना तो भूल ही गया जबकि अगले ही दिन वे उन्‍हें वृन्‍दावन ज्‍योतिष की पढाई के लिए ले जाने वाले थे।

यह सुनकर उन्‍होंने कहा कि तुम्‍हें एक दिन भी पूजा करना याद नहीं रहा तो तुम ज्‍योतिष के क्षेत्र में आगे कैसे बढ पाओगे,

क्‍योंकि इस क्षेत्र में तो पूर्ण रूप से आध्‍यात्‍म व प्रभु के प्रति झुकाव जरूरी होता है इसलिए तुम्‍हारा वृन्‍दावन जाना रद्द किया जाता है।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

महाराज (Shyam sundar Parashar) उस समय ज्‍वर से पीडित थे इसलिए उनसे पूछा गया कि क्‍या तुम वृन्‍दावन जाकर ज्‍योतिष की पढाई करना चाहोगे?

तो महाराज जी जब 05 साल के थे, तब से अपने पिताजी के साथ श्रावण मास में वृन्‍दावन धाम प्रतिवर्ष आया करते थे

इसलिए उनका श्रीधाम वृनदावन से बहुत लगाव था। इसी लगाव के चलते उन्‍होंने बडे ही उत्‍साह से अपनी स्‍वीकृति दे दी।

श्रीधाम वृनदावन जाने की उनके मन में इतनी खुशी हुयी कि उसी दिन उनका ज्‍वर ठीक हो गया

और अगले दिन पिताजी के साथ अपनी दिनचर्या का सामान लेकर श्रीधाम वृनदावन आ गये।

जब पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) के जीवन में नया मोड़ आया:-

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) बताते हैं कि वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गयी, क्‍योंकि यदि उस दिन वे हॉ न करते तो आज वे किसी सरकारी नौकरी में होते और उनके बडे भाई ज्‍योतिषाचार्य होते।

जबकि वर्तमान में उनके बडे भाई सरकारी नौकरी में हैं और महाराज जी क्‍या हैं, आप सभी जानते ही हैं।

पाराशर जी का श्रीधाम वृनदावन के धर्मसंघ विद्यालय में एडमीशन हो गया।

जो धर्मसम्राट स्‍वामी श्री करपात्री जी महाराज के द्वारा स्‍थापित है तथा रमणरेती वृन्‍दावन में इस्‍कान मंदिर के पास है।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

उनके ही गॉव के एक मित्र हैं श्री मदनमोहन शास्‍त्री। वे पहले से ही श्रीधाम वृन्‍दावन में रहकर पढाई करते थे इसलिए महाराज जी उन्‍हीं के साथ मालाधारी अखाडा में रहने लगे।

धर्मसंघ विद्यालय में किसी भी छात्र को बिना यज्ञोपवीत के प्रवेश नहीं मिलता है। जिसका जनेउ संस्‍कार हो गया है वही छात्रावास में रह सकता है।



महाराज जी और उनके गॉव के साथी मदनमोहन का यज्ञोपवीत संस्‍कार नहीं हुआ था इसलिए वे दोनों लोग मालाधारी अखाडा में रहते थे और पढाई करने के लिए रमणरेती आते थे।

जब महाराज जी (Shyam sundar Parashar) रोने लगते थे:-

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) जब छात्रावास में रहते थे तो उनके जो अन्‍य साथी थे वे कभी-कभी घर की याद में रोने लगते थे,

चूंकि महाराज जी को श्रीधाम वृन्‍‍दावन में बहुत मजा आता था इसलिए उन्‍हें घर की याद उतनी नहीं आती थी,

लेकिन जब वे अपने साथियों को रोता हुआ देखते थे तो फिर वे भी घर की याद में रेाने लगते थे।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) जब छुटि्टयों में घर आते थे तो अपनी मॉ के हाथ से बने कढ़ी चावल बडे ही प्रेम से खाते थे और जब छुट्टियों के बाद श्रीधाम वृन्‍दावन वापस जाते थे तो

उनकी माताजी भावुक मन से नास्‍ता के रूप में सकलपारे और पंजीरी बनाकर बांध देती, जो बहुत दिनों तक नाश्‍ता के विकल्‍प के रूप में उपलब्‍ध रहते थे। 

छात्रावास की एक घटना:-

एक बार महाराज जी (Shyam sundar Parashar) के मित्र मदनमोहन जी को बुखार आ गया तो महाराज जी उनको विद्यायल के धर्मार्थ औषधालय में ला रहे थे,

चूंकि पैसे ज्‍यादा नहीं होते थे इसलिए पैदल ही दोनों लोग आ रहे थे कि

रास्‍ते में ही मदनमोहन को ज्‍वर के कारण आयी अत्‍याधिक कमजोरी से चक्‍कर आ गया और वे रास्‍ते में ही गिर पडे। जिससे महाराज जी घबरा गये कि अब क्‍या होगा? क्‍या किया जाय?

वे इतना सोच ही रहे थे कि तभी धर्मसंघ के गुरुजी वहॉ से गुजर रहे थे तो उनकी नजर अपने विद्यालय के दोनों छात्रों पर पडी तब उन्‍होंने आकर पूछा कि क्‍या बात है?

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

तब महाराज जी (Shyam sundar Parashar) ने सारी बात बतायी जिसे सुनकर गुरुजी भावुक हो गये और तुरंत रिक्‍शा में बैठाकर औषधालय भेजा

और कहा कि तुम्‍हें रोज रोज अपने छात्रावास से आश्रम में आकर पढने की जरुरत नहीं है,

तुम दोनों विद्यालय के छात्रावास में ही रहो, जिसे सुनकर महाराज जी बहुत खुश हो गये।

महाराज जी बताते हैं कि यह अपवाद था कि बिना यज्ञोपवीत संस्‍कार के भी उन्‍हें छात्रावास में स्‍थान मिल गया,

यह उनके गुरुजी की दया का परिणाम था। और कुछ ही दिनों के बाद उनका यज्ञोपवीत संस्‍कार किया गया।

बनने गये थे ज्‍योतिष और बन गये कथावाचक:-

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) के दादाजी ज्‍योतिष में पारंगत थे इसलिए महाराज जी के पिताजी ने उन्‍हें ज्‍योतिष की शिक्षा लेने के लिए श्रीधाम वृन्‍दावन भेजा था।

लेकिन परिस्थितियॉ कुछ इस प्रकार से निर्मित हुयी कि धर्म संघ विद्यालय में स्‍वामी करपात्री जी महाराज ने एक नियम बना रखा था



कि विद्यायल में प्रतिदिन एक घंटे श्रीमद भागवत की कथा होनी चाहिए, जिससे कि यहॉ रहकर पढने वाले बच्‍चों को बचपन से ही धर्म का संस्‍कार प्राप्‍त हो।

इसलिए वृन्‍दावन के ही विद्वान संत श्री रामानुजाचार्य जी महाराज प्रतिदिन एक घंटे कथा कहने के लिए विद्यालय आते थे।

स्‍वामी करपात्री जी महाराज के एक ब्रम्‍हचारी शिष्‍य थे, श्री केशवमणि।

जो उसी आश्रम में निवास करते थे जिनको स्‍वामी जी द्वारा संन्‍यास दीक्षा देने के उपरांत स्‍वामी केशवानंद सरस्‍वती नाम दिया गया था।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

वृद्धावस्‍था में उनकी नेत्रज्‍योति चली गयी थी इसलिए छात्र श्‍यामसुंदर पाराशर को ही उनकी सेवा का दायित्‍व दिया गया था जैसे उन्‍हें कमरे से मंदिर तक बाहर लाना,

मंदिर से अंदर कमरे तक छोड़ना, उनके भोजन प्रसाद की व्‍यवस्‍था करना, उनकी दैनिक क्रिया में सहयोग करना इत्‍यादि काम महाराज (Shyam sundar Parashar) को ही करना होता था।  

जब श्री रामानुजाचार्य जी महाराज प्रतिदिन एक घंटे शाम 04 से 05 बजे तक कथा करते थे तो उसमें मुख्‍य श्रोता श्री केशवमणि जी महाराज होते थे।

कथा में अन्‍य विद्धार्थी बैठें या न बैठेंं, लेकिन महाराज (Shyam sundar Parashar) का बैठना अनिवार्य होता था,

क्‍योंकि श्री केशवमणि जी महाराज की सेवा का दायित्‍व पाराशर जी को दिया गया था।

महाराज की आयु उस समय बहुत अल्‍प थी, लगभग 13 साल, इसलिए कुछ समझा नहीं आता था।

जिससे कथा सुनते-सुनते नींद आ जाती थी और नींद में बैठे-बैठे कभी-कभी लुढ़क भी जाया करते थे, ऑख खुली तो फिर सावधान होकर बैठ जाते थे।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

कुछ इस प्रकार महाराज (Shyam sundar Parashar) भी कथा श्रवण करते थे। यह बात सन 1980 की है और यही क्रम 06 वर्ष तक चला, क्‍योंकि महाराज जी छात्रावास में 06 वर्ष तक रहे।

02 वर्ष में श्रीमद भागवत की एक आवृत्ति पूर्ण हो जाया करती थी। इस प्रकार 06 वर्षों में श्रीमद् भागवत की  03 आवृत्तियॉ संपन्‍न हुयी।

प्रथम बार में तो पाराशर जी को कुछ भी समझ नहीं आया, बस किस्‍से कहानी के रूप में थोड़ा बहुत याद था, परंतु दूसरी आवृत्ति में कुछ-कुछ समझ में आने लगा और भागवत के प्रति रूचि बढ़ने लगी।

कथा में एक-एक श्‍लोक की वृहद व्‍याख्‍या की जाती थी, जिसे महाराज जी (Shyam sundar Parashar) बडी ही रुचि के साथ श्रवण किया करते थे

और धीरे-धीरे भागवत का रंग पाराशर जी पर चढ़ने लगा। इस प्रकार पाराशर जी ने स्‍वभावत: ही भागवत की शिक्षा प्राप्‍त कर ली।

महाराज जी का लक्ष्‍य था ज्‍योतिषाचार्य बनने का, लेकिन बार-बार भय के कारण, जबरदस्‍ती व अनिच्‍छापूर्वक सुनी भागवत कथा ने उनके मन में भागवत का बीज बो दिया और

उनकी उम्र बढ़ने के साथ-साथ भागवत का बीज भी बढ़ने लगा और महाराज जी कथावाचक बन गये। जबकि कथावाचक बनने का उनका लक्ष्‍य ही नहीं था।

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) की पहली भागवत कथा कुछ इस प्रकार हुयी:-

एक बार की बात है महाराज जी (Shyam sundar Parashar)  उसी दौरान छुटि्टयों में अपने घर आये हुये थे

और उनके पडौस के गॉव लौड़ी ग्राम में कुछ लोग भागवत कराना चाहते थे इसलिए महाराज के घर उसी का मार्गदर्शन लेने आये हुये थे।

उन्‍होंने साधारण रूप से बालक श्‍याम सुंदर को देखा और सहज ही पूछा कि बेटा तुम क्‍या करते हो? कहॉ रहते हो?

तब महाराज जी ने बताया कि मैं वृन्‍दावन में रहकर पढाई करता हूं उस समय महाराज जी उम्र महज 15 साल थी।



लोगों के उस समूह में से एक सज्‍जन ने कहा किे बेटा क्‍या तुम भागवत भी कहते हो?

तो उन्‍होंने कहा कि अभी तक नहीं कही है, पर लक्ष्‍य बना लिया है कि आगे चलकर मैं भागवत ही करूंगा।

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तब वे सज्‍जन बोले कि बेटा हमने भी अभी तक कथा नहीं करवाई है और तुमने भी अभी तक कथा नहीं की है इसलिए तुम हमारे यहॉ से शुरुआत करो।

बोलो कह सकोगे? तब महाराज जी ने कहा कि अभी तक कही तो नहीं है पर हॉ मैं कह पाउंगा, मुझे पूरा विश्‍वास है।

तब सभी लोगों ने महाराज जी के पिताजी को सारी बात बतायी कि हम कथा के संबंध में आपसे मार्गदर्शन लेने आये थे

और हमारा विचार था कि वृन्‍दावन के किसी विद्वान से कथा करायी जाये पर आपका छोटा बेटा हमें तो पसंद आ गया।

हम चाहते हैं कि वह ही हमारे यहॉ कथा करे। तब पिताजी ने अपने छोटे बेटे श्‍याम सुंदर से पूछा कि क्‍या तुम कथा कह पाओगे?

तो श्‍याम सुंदर ने पूरे विशवास भरे मन से कथा करने में अपनी स्‍वीकृति प्रकट की और पाराशर जी महाराज ने अपनी पहली कथा का शुभारंभ किया।

और ऐसे शुरुआत हुयी महाराज जी की कथावाचक बनने की।

जब पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) को रासलीला का नचइया कहा गया:-

बात उस समय की है जब महाराज जी (Shyam sundar Parashar) 17 साल के थे, उनकी पहली कथा संपन्‍न होने के बाद आसपास के लोग उन्‍हें जानने लगे

इसलिए मध्‍यप्रदेश के मुरैना जिले के खड़याहार गॉव के एक पंडित जी ने महाराज जी से भागवत सुनाने को कहा।

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) ने कहा कि जरूर सुनायेंगे। तब मुहुर्त के अनुसार समय का निर्धारण किया गया

और निर्धारित समय पर महाराज जी अकेले पहुंच गये, क्‍योंकि उस समय साज बाज का इतना प्रचलन नहीं था।

पंडित जी और उनके परिवार व ग्रामवासियों ने महाराज जी का स्‍वागत किया और महाराज जी के ठहरने की उचित व्‍यवस्‍था कर उनको आराम करने के लिए कहा।

उसी गॉव के पडौस में एक गॉव था सिहौनिया, जिसे व्‍यासों की नगरी कहा जाता था, क्‍योंकि वहॉ के लगभग हर घर में कथावाचक थे,

तो जैसे ही उन्‍होंने सुना कि वृन्‍दावन से कोई कथावाचक आये है हमारे पडोस के गॉव में कथा करने, तो सभी आ गये और वे महाराज जी से मिले।

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लेकिन महाराज जी की पीठ पीछे सभी कथावाचक, मुख्‍य यजमान पंडित जी से बोले कि ये कल का बच्‍चा कहां से पकड कर लाये हो? ये क्‍या कथा कहेगा?

हम इतने बडे-बड़े व्‍यास यहॉ बैठे हैं, हममें  से तुम्‍हें कोई समझ में नहीं आया, जो इसे कथा कहने के लिए बुला लाये हो।

हमें तो यह रासलीला वाला नचइया लग रहा है, यह क्‍या कथा सुनायेगा?

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) अंदर के कमरे में बैठे हुये यह सब सुन रहे थे, इस प्रकार के वक्‍तव्‍य को सुनकर महाराज जी भयभीत तो हुये ही, क्‍योंकि वे अकेले ही आये थे।

इसके साथ ही साथ वे हतोत्‍साहित भी हुये कि यहॉ तो बडे-बड़े कथावाचक बैठे हुये हैं,

जबकि मेरी तो यह दूसरी ही कथा है, मैं इनके सामने क्‍या कथा सुना पाउंगा। कुछ इस प्रकार का द्वन्‍द महाराज जी के मन में चलने लगा।

जब पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) को चुनौती दी गयी:-

शाम के समय महाराज जी (Shyam sundar Parashar) से मिलने एक सज्‍जन आये, जो उनके ही गॉव के थे और इस गॉव में नौकरी करते थे, तो महाराज जी ने उन्‍हें अपने गॉव के होने के नाते सारी बात बतायी।



तो उन्‍होंने कहा कि तुम चिंता मत करना, मैं यहीं हॅू, तुम्‍हें किसी से डरने की जरूरत नहीं है, तुम बेधड़क होकर के निर्भीक मन से कथा कहो।

तब महाराज को थोड़ी हिम्‍मत आ गयी और अगले दिन से उन्‍होंने कथा कहना प्रारंभ कर दिया।

श्रोताओं में वे सभी कथावाचक भी रहते थे, जो महाराज जी (Shyam sundar Parashar) को रासलीला का नचइया समझते थे।

महाराज जी ब्‍यासपीठ पर बैठकर, बिहारी जी और अपने गुरुदेव का ध्‍यान करके रोज सुबह 10 से शाम 04 बजे तक कथा कहते।

सभी श्रोतागण बड़े ही भाव से कथा श्रवण करते और खूब प्रसन्‍न होते। इसी प्रकार कथा के 06 दिवस हो गये।

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जब छठवें दिन की कथा कहकर महाराज जी विश्राम कर रहे थे, तब उस गॉव के सभी कथावाचक महाराज जी के पास आये और बोले कि बेटा भागवत तो सभी सुना ही लेते है,

क्‍योंकि सब कहानी किस्‍से हैं, इसमें कोई बडी बात नहीं है।

लेकिन यदि तुम वास्‍तव में भागवत के पंडित हो तो कल के दिन तुम हमें एकादश स्‍कंद सुनाओ। जो सातवें दिन सुनाया जाता है, प्राय: लोग सातवे दिन सुदामा चरित्र सुनाकर कथा का समापन कर देते है,

तुम एकादश स्‍कंद सुनाओ तब हम मानेंगे कि तुम सचमुच अच्‍छे कथावाचक हो।

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) ने बड़ी विनम्रता के साथ उन सभी से कहा कि महाराज इस गॉव में एकादश स्‍कंद को समझने वाले श्रोता तो हैं नहीं,

इसलिए यदि आप सामने बैठकर सुनने को तैयार हों तो मैं जरूर सुनाउंगा, तो वे लोग बोले कि हां हम जरुर सुनेंगे।

ऐसा क्‍या हुआ कि जब पाराशर जी को व्‍यासपीठ से पकड़ कर उठाना पड़ा:-

सातवें दिन की कथा नियत समय पर प्रारंभ हुयी और कथा समापन का समय भी निश्चित था शाम 04 बजे का,

लेकिन जैसे ही महाराज जी (Shyam sundar Parashar) ने एकादश स्‍कंद की व्‍याख्‍या करना प्रारंभ किया तो शाम के 07 बजे तक कथा चली अर्थात् पूरे 09 घंटे ।

चूंकि शाम के समय गॉव के लोगों को अपने पशुओं को बांधना होता है, उनके चारा पानी की व्‍यवस्‍था करना होता है और दुग्‍ध दोहन भी करना होता है

इसलिए उन्‍हीं कथावाचक श्रोताओं में से एक पंडित जी खडे होकर बोले कि बस-बस बेटा अब समय का अतिकाल हो रहा है,

हमें पूरा विश्‍वास हो गया कि तुमने बहुत अच्‍छी तैयार की है, हमें बडी आत्‍मसंतुष्टि मिली, अब आप कथा को विश्राम की ओर ले चलो।   

तब फिर महाराज जी (Shyam sundar Parashar) ने कथा विश्राम की और भागवतजी की आरती के पश्‍चात् सभी श्रोता प्रसाद ग्रहण करके अपने-अपने घर को जाने लगे।

महाराज जी भी अब ब्‍यास पीठ से उठे, लेकिन यह क्‍या वे तो खड़े ही नहीं हो पा रहे थे,

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

क्‍योंकि सुबह 10 बजे से एक ही मुद्रा में जो बैठे थे, कथा कहने के दौरान तो पूरा ध्‍यान कथा पर था इसलिए उन्‍हें कोई समस्‍या नहीं हुयी, लेकिन जब उठने का समय आया तो उनके हाथ पैर कांपने लगे।

उनके पांवों में बल ही नहीं बचा था कि उनके शरीर का भार उठा सकें, उनके हाथ पांव जाम हो चुके थे।

लोग यह दृश्‍य देखकर हैरान और चिंतित हो गये और वे लोग ही महाराज जी (Shyam sundar Parashar) को उठाकर अंदर के कमरे में ले गये और उनके पैरों की तेल से मालिश की।

तब कहीं जाकर महाराज जी ठीक से खड़े हो पाये।

लेकिन महाराज जी को इस बात की जरा भी चिंता नहीं थी कि उनके पांव ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, वे तो मन ही मन आत्‍मसं‍तुष्टि से भरे हुये थे कि वह गॉव, जिसे ब्‍यासों की नगरी कहा जाता है,

वहॉ के कथावाचकों ने मेरी कथा पर अपनी आत्‍मसंतुष्टि प्रकट की कि बेटा हम बहुत प्रसन्‍न हुये, तुमने बहुत ही अच्‍छी तैयारी की है।



महाराज जी को उस कथा में यही पारितोषिक मिला था।   

डॉ श्‍याम सुंदर पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) के मधुर कंठ का गोपनीय राज:-

बात उस समय की है जब महाराज जी (Shyam sundar Parashar) धर्म संघ विद्यालय में पढ़ रहे थे। विद्यालय का एक नियम था कि यहॉ पढ़ने वाले प्रत्‍येक विद्यार्थी को ब्रम्‍ही जड़ी बूटी पिलायी जाती थी।

कथास्‍टार के प्रिय पाठकों, पहले आप यह जान लीजिए कि ब्रम्‍ही जड़ी बूटी क्‍या काम करती है और इसे पीने की विधि क्‍या होती है?

ब्रम्‍ही जड़ी बूटी को एक विशिष्‍ट तिथि‍ में भयंकर ठंडी के मौसम में (माघ पूष के महीने में) रात के 12 बजे, कंठ तक पानी में खड़े होकर पिया जाता है।

मतलब नदी में आपको गर्दन तक गहरे पानी में जाकर खड़े होना होगा और वो भी रात के 12 बजे, कपडे उतारकर।

इसके पीने के दो फायदे होते हैं पहला, दिमाग की मेधा शक्ति में जबरदस्‍त वृद्धि होती है। मतलब कुशाग्र बुद्धि हो जाती है और दूसरा, कंठ चमत्‍कारी रूप से सुरीला हो जाता है।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

इसे पीने के बाद यदि इसका पाचन हो जाता है तो दिमाग की मेधा शक्ति बढ़ जाती है। चूंकि ब्रम्‍ही का स्‍वाद अत्‍याधिक कड़वा होता है इसलिए अधिकतर लोग इसे पीने के बाद बमन (उल्‍टी) कर देते हैं

तो इसका दूसरा फायदा यह होता है कि यदि उल्‍टी हो जाये तो कंठ अत्‍याधिक गुणवान तरीके से सुरीला हो जाता है।

परंतु इसमें सावधानी इस बात की रखनी होती है कि बमन (उल्‍टी) करते समय मुंह से निकलने वाले तरल पदार्थ का कोई भी कण हमारे शरीर पर नहीं गिरना चाहिए।

अन्‍यथा पूरे शरीर में कुष्‍ठ रोग हो जाता है इसीलिए इसे कंठ तक बहते हुये पानी में खड़े होकर पिया जाता है ताकि बमन (उल्‍टी) होने पर मुंह से निकला तरल पदार्थ शीघ्र ही बह जाये और उसके कण शरीर पर न गिरे।

तो फिर पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) के साथ क्‍या हुआ:-

विद्यालय के नियमानुसार जब वृन्‍दावन में ठंड का मौसम आया तो सभी छात्रों की तरह महाराज जी (Shyam sundar Parashar) को भी ब्रम्‍ही बूटी पीने के लिए कहा गया तथा संपूर्ण विधि समझा दी गयी और तिथि‍ निश्चित किया गया।

अब वह रात आयी जब इस क्रिया को संपन्‍न किया जाना था।

ठंड की रात में कपड़े उतारकर महाराज जी यमुना जी में कंठ तक पानी में जाकर खड़े हो गये और मन ही मन सोचने लगे कि इतनी कड़वी बूटी मैं कैसे पी पाउंगा,

लेकिन पीना तो था ही और महाराज जी पी गये। आश्‍चर्य की बात यह है कि जब कोई पहली बार इसे पीता है तो वमन (उल्‍टी) निश्चित होती है, लेकिन महाराज जी उसका पाचन कर गये।



पाचन करने में कठिनाई अवश्‍य हुयी, जब तक उसका कड़वापन महसूस होता रहा, वे नदी में ही डटे रहे और जब स्‍वाद सामान्‍य हो गया तभी यमुना जी से बाहर आये।

अगले साल फिर इसी क्रिया को दोहराया गया तो महाराज जी मन में वही पिछले साल का घटनाक्रम चलने लगा और वही पुराना कड़वा स्‍वाद याद आने लगा, जिस कारण इस बार उन्‍होंने बमन (उल्टी) कर दिया,

लेकिन फायदा तो इसका भी होना ही था और महाराज जी (Shyam sundar Parashar) के कंठ में मॉ सरस्‍वती का वास सदा के लिए हो गया।

पाराशर जी ने आध्‍यात्‍म पीठ की स्‍थापना क्‍यों की:-

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) का कहना है कि जहॉ-जहॉ भी वे कथा करने जाते हैं तो वहॉ के रसिक श्रोताओं द्वारा या विद्वानों द्वारा उनसे एक ही शिकायत की जाती है

कि आज की आधुनिक कथा में अब उन्‍हें कथा सुनने को नहीं मिलती है।

केवल भजन संगीत व गाना बजाना ही रह गया है, कथा कहीं विलुप्‍त होती जा रही है।

आज के समय में भागवत कथा का स्‍वरूप बदल गया है, केवल गाना बजाना ही रहा गया है और धीरे-धीरे भागवत कथा लुप्‍तप्राय: होती चली जा रही है।

शंकराचार्य जी महाराज ने डॉ श्‍याम सुंदर पाराशर जी से विषेश रुप से कहा कि वर्तमान समय में नई पीढ़ी के जितने भी कथा व्‍यास है,

वो तुम्‍हारा ही अनुशरण कर रहे हैं, तुम्‍हारी कैसेट सुन-सुन कर ही वे कथावाचक बन रहे हैं।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

नये कथावाचक अपनी कथाओं के दौरान केवल किस्‍से कहानियॉ ही सुनाते हैं और हर दस मि‍नट में एक भजन गा देते हैं

इसलिए तुम्‍हें इस दिशा में कुछ करना चाहिए ताकि आगामी कथावाचाकों की जो पीढी है, वह स्‍वस्‍थ रूप से कथा कह सके।

तब महाराज जी (Shyam sundar Parashar) के मन में संकल्‍प उठा कि धर्म व शास्‍त्रों के प्रचार प्रसार व देववाणि संस्‍कृत के विकास के लिए कुछ करना चाहिए।

इसी परिपेक्ष्‍य में महाराज जी ने वृन्‍दावन में ही पाराशर आध्‍यात्‍म पीठ की स्‍थापना की, जिसका उद्घाटन 27 फरवरी 2020 को हुआ था, जिसका उद्देश्‍य आध्‍यात्‍म का विकास करना है।

नयी पीढी के कथावाचक अपनी कथा में भागवत के श्‍लोकों काे शामिल करें और भागवत में संगीत तो हो, लेकिन शास्‍त्रीय संगीत हो।

कथा में बहुत ज्‍यादा संगीत होने से भागवत का वास्‍तविक स्‍वरूप प्रभावित हो जाता है, जिससे कथा प्रेमियों को भी कष्‍ट होता है।

कोरोना की दूसरी लहर में जब महाराज जी (Shyam sundar Parashar) पॉजीटिव हो गये:-

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) के जीवन में यह घटना ऐसी घटी कि महाराज जी का पूरा जीवन ही बदल गया।

महाराज जी यह घटना बताने में संकोच करते हैं, उन्‍हें लगता है‍ कि यह हम सबको बताना उचित होगा या नहीं,

लेकिन फिर वो कहते हैं कि शायद यह घटना आपके जीवन को भी रूपांतरित कर दे और आप अपने मार्ग पर बड़ी ईमानदारी पूर्वक अपने कर्तव्‍यों का पालन करें इसलिए वह बताते हैं कि

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

हरिद्वार में सन 2021 महाकुंभ का लाभ लेने के बाद वह रीवा, मध्‍यप्रदेश भागवत कथा कहने हेतु गये, लेकिन स्‍वास्‍थ्‍य अस्‍वस्‍थ होने के कारण डॉक्‍टरों की सलाह पर कोरोना की जॉच करवाई,

जिसमें जॉच पाजीटिव आयी और मुझे अस्‍पताल में आइसोलेट कर दिया गया।

वो बताते हैं कि अस्‍पताल में पहले दिन ही उन्‍हें लगा कि यह जीवन रहेगा कि नहीं। उसी रात जब वो लघुशंका के लिए मूत्रालय गये, तो शरीर में आयी कमजोरी के कारण चक्‍कर खाकर जमीन पर ही गिर गये

तो उन्‍हें एक बार फिर लगा कि उनका जीवन अंत की ओर है, लेकिन वहॉ उपस्थित लोगों द्वारा उठाकर बेड पर लिटा दिया गया।

जब भगवान ने महाराज जी (Shyam sundar Parashar) के प्राण निकाल लिये:-

बेड पर कुछ देर आराम करने के बाद जब उन्‍होंने अपनी आंखे खोली तो देखा कि उनके सामने एक मित्र की भांति श्री हरि खड़े हैं और उनसे मुस्‍कुराकर पूछा कि पराशर चलना है कि रहना है?

तो महाराज जी (Shyam sundar Parashar) ने चकित होते हुये श्रीहरि से पूछा कि हे प्रभु मुझे दोनों का मतलब समझाइये।

तो श्रीहरि मुस्‍कुराते हुये बोले कि देखो पराशर अगर तुम सांसारिक सुख-दुख, कष्‍ट-पीड़ा से मुक्ति चाहते हो तो चलो हमारे धाम और इतना कहते ही श्रीहरि ने महाराज जी को शरीर से बाहर निकाल लिया।



तो महाराज जी ने बड़ी आशा भरी निगाहों से श्री‍हरि को देखा और जब उन्‍होंने अपने हाथ और पैरों को हिलाया तो उन्‍हें कोई कष्‍ट या दर्द और शरीर का भीअनुभव नहीं हो रहा था

और महाराज जी अपने आप को पूरी तरह स्‍वस्‍थ महसूस कर रहे थे। उसी क्षण भगवान ने कहा कि पराशर अब तुम सभी कष्‍टों से मुक्‍त हो गये हो।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

तब महाराज जी (Shyam sundar Parashar) ने भगवान से कहा कि प्रभु अब आगे इस शरीर का क्‍या होगा? तो प्रभु ने कहा कि इस शरीर को तो जला दिया जायेगा।

महाराज जी ने फिर पूछा कि क्‍या इस शरीर से मुक्ति मिल जायेगी? या दोबारा शरीर मिलेगा?

तब श्रीहरि ने कहा कि पराशर जैसी तुम्‍हारी इच्‍छा। और श्री हरि ने कहा कि बोलो पराशर तुम क्‍या चाहते हो?

तब महाराज जी ने भगवान से निवेदन किया कि प्रभु अभी जो सत्‍कर्म करने चाहिए थे, वह मैं संतोषपूर्ण तरीके से नहीं कर पाया हॅू, इसलिए मुझे दोबारा शरीर चाहिए।

तब श्रीहरि ने महाराज जी (Shyam sundar Parashar) से पूछा कि तुम कैसा शरीर चाहोगे? तो महाराज जी बोले कि यदि ब्राम्‍हण शरीर मिल जाये तो अतिउत्‍तम रहेगा।

तब प्रभु बोले कि यदि तुम्‍हारी यही इच्‍छा है तो इससे अच्‍छा शरीर और कौन हो सकता है, जिसमें तुम्‍हें ब्राम्‍हण कुल, सनातन धर्म और भारत जैसी पवित्र भूमि मिली है।

तब महाराज बोले कि यदि यही बात है तो आप मुझे यही शरीर वापस कर दो, मुझे जो कुछ करना होगा मैं इसी शरीर से कर लूंगा।

तब भगवान ने कहा कि जैसी तुम्‍हारी इच्‍छा और इतना कहकर ठाकुरजी ने महाराज (Shyam sundar Parashar) को इसी शरीर में पुन: प्रवेश करा दिया।

और बोले कि जो भी तुम्‍हारा शेष काम रहा गया है वह इस शरीर से पूरा कर लो। इतना कहकर प्रभु अपने धाम को चले गये।

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) का नया संकल्‍प:-

उसके बाद महाराज जी (Shyam sundar Parashar) अकेले पड़े-पड़े मन ही मन यह सोचने लगे कि इस शरीर के माध्‍यम से मुझे जो जीवन मिला था, उसका समय आज पूरा हो गया था।

श्री ठाकुरजी ने आज मुझे एक अतिरिक्‍त नया जीवन प्रदान किया है जिसे अब मैं केवल सत्‍कर्मों, धार्मिक कार्यों और अपने उद्देश्‍य की पूर्ति में ही लगाउंगा।

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) कहते हैं कि उन्‍हें जो अनुभव हुआ और श्री ठाकुर जी ने उन्‍हें जो अनुभव कराया है वो उनके द्वारा कही गयी भागवत कथा में जो कहते थे उसका उन्‍होंने प्रत्‍यक्ष अनुभव किया है।

श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी

हम जब कभी अपने मार्ग से भटक जाते हैं तो वह हमारी उंगली पकड़कर सही मार्ग में चलने के लिए प्रेरित करता है

इसलिए इस कथा से आप प्रेरित होकर अपने जीवन के बचे हुये समय का सदुपयोग सत्‍कर्मों के लिए करें

और अपने मन में हमेशा यह बात ध्‍यान रखें कि करोड़ो स्‍वर्ण मुद्रायें खर्च करके भी बीते हुये एक पल को वापस नहीं लाया जा सकता है इसलिए हमेशा अपने लक्ष्‍य को ध्‍यान में रखें और उसी की ओर अग्रसर रहें।

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) का समाज को संदेश:-

आज के बच्‍चों में प्रतिभा तो खूब है, लेकिन भागदौड़ के जीवन में घर के बडे उन्‍हें अपने संस्‍कार नहीं दे पा रहे हैं, जिससे उनकी नींव कमजोर हो रही है।

मैं अक्‍सर शाम के समय दो घंटे का समय अपने बच्‍चों के साथ बितता हूॅ और उन्‍हें श्‍लोक, स्‍तुति, स्‍त्रोतम्, संस्‍कृत भाषा आदि का पाठ करवाता हॅू तथा शास्‍त्रीय संगीत भी सिखाता हॅू।

महराज जी (Shyam sundar Parashar) का मानना है कि घर के बड़े बुजुर्ग प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा समय बच्‍चों के बिताये और

भागवत या रामचरित मानस के पॉच दोहे हर घर में अपने बच्‍चों को सुनाने लगें तो आगे आने वाली पीढिया धर्म के प्रति जागरुक हो जायेंगी।



आज की वर्तमान समस्‍याओं के बीच में हमें अपने आप को धर्म परायण बनाते हुये भगवान का आश्रय लेना चाहिए और भारत के आध्‍यात्‍म की उन्‍नति में हमें अपना सहयोग प्रदान करना चाहिए।

क्‍योंकि इस समय भारत देश का कद संपूर्ण विश्‍व में बहुत तेजी से बढ रहा है और पूरा विश्‍व केवल भारत की तरफ ही देख रहा है, क्‍योंकि भारत बहुत जल्‍द ही विश्‍व गुरु के पद पर प्रतिष्ठित होने जा रहा है।

ऐसी स्थिति में हम सभी भारतवासियों का कर्तव्‍य है कि भारत को विश्‍व गुरु बनाने में हम किस प्रकार से योगदान दे सकते हैं,

उस दिशा में हम सबको विचार करना चाहिए। और केवल आध्‍यात्मिक क्षेत्र में ही नहीं, अपितु हर दिशा में हमारा देश आगे बढ रहा है।

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) के गुरु:-

डॉ श्‍याम सुंदर पाराशर जी ने श्री अवधधाम के पंचरसाचार्य स्‍वामी श्री रामहर्षण दास जी महराज ‘सरकार’ से राममंत्र की वैष्‍णवी दीक्षा प्राप्‍त की।

पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) कथा के बारे में विशेष जानकारी:-

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) की एक भागवत कथा की सेवा दस लाख रुपये होती है, जिसमें से पचास प्रतिशत राशि पहले देना होता है और बाकी की राशि कथा समापन के पश्‍चात् देना होता है।

जब भी किसी तीर्थ स्‍थान पर महाराज जी की कथा होती है तो वे अपने माता-पिता को जरूर ले जाते हैं।

महाराज जी (Shyam sundar Parashar) की प्रतिवर्ष 36 से 40 कथाये होती हैं, अत: लगभग पूरा वर्ष महाराज जी का घर से बाहर ही बीतता है। अभी तक महाराज जी देश और विदेशों में लगभग 800 से अधिक कथायें कर चुके हैं।

तीर्थराज प्रयाग में माघ मेला के पावन अवसर पर प्रतिवर्ष महाराज जी कथा विगत 30 वर्षों से संपन्‍न हो रही है।

इसी प्रकार हरिद्वार में विगत 33  वर्षों से पाराशर जी की कथा संपन्‍न हो रही है। कोरोना के कारण वर्ष 2020 में नहीं हुयी, अन्‍यथा 11 से  18 अप्रैल प्रतिवर्ष वहॉ कथा सुनिश्चित रहती है।

Shyam sundar Parashar जी भारत के अनेक राज्‍यों जैसे मध्‍यप्रदेश, उत्‍तरप्रदेश, राजस्‍थान, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, बिहार, महाराष्‍ट्र, केरला, उड़ीसा, झारखंड व छत्‍तीसगढ़ आदि में कथा कर चुके हैं

इसके अलावा विश्‍व के कई देशो में भी महाराज जी कथा कह चुके हैं जिनमें से डेनमार्क, थाइलैंड, हॉलैंड, सूरीनाम, नेपाल आदि।



अन्‍त में 

मुझे आशा है कि आप डॉ श्‍यामसुंदर पाराशर जी (Shyam sundar Parashar) के जीवन से संबंधित लगभग-लगभग सभी जानकारियों से अवगत हो गये होंगे और लेख पढ़कर आनंदित भी हुये होंगे।

वैसे आपकी जानकारी के लिए मैं आपको बता दूं कि आप तक यह जानकारी पहुंचाने के लिए मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ती है ताकि आप तक सही जानकारी पहुंच सके।

इसलिए आप हमारे इस प्रयास को समर्थन देने के लिए हमें अपना अमूल्‍य सुझाव कमेंट करके बताना न भूलें, हम आपके कमेंट का इंतजार करते हैं।

Dr Shyam sunder Parashar Biography  लेख को पढ़ने के लिए आपका धन्‍यवाद।


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2 thoughts on “Dr Shyam sunder Parashar Biography In Hindi | श्याम सुंदर पाराशर की जीवनी”

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